🚩शास्त्र में इसका प्रमाण भी है
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..गीता में भगवान् कहते है ...'' जो भक्त मेरे लिए प्रेम सेपत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है ,उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ , वह पत्र पुष्प आदि मैं ग्रहण करता हूँ ...गीता ९/२६
अब वे खाते कैसे हैं , ये समझना जरुरी है l
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हम जो भी भोजन ग्रहण करते है , वे चीजे पांच तत्वों से बनी हुई होती है l क्योकि हमारा शरीर भी पांच तत्वों से बना होता है .. इसलिए अन्न, जल, वायु, प्रकाश और आकाश तत्व की हमें जरुरत होती है, जो हम अन्न और जल आदि के द्वारा प्राप्त करते है।
देवता लोग या देव योनि ईश्वर का प्रसाद समझ कर सुगंध के रूप में ग्रहण करते है। उनके पास कोई भौतिक शरीर ना होने से कोई भूख का अनुभव उन्हें नहीं होता किंतु वह लोग गंध, और प्रकाश और वायु का सेवन करते है।
उनकी योनि यही ग्रहण करने बनी है इसीलिए वह इस तीन चीजों का सेवन करते है। वह सब उस देव योनि के शरीर पर आश्रित है कि कौन किसी तत्व के देवता है। जो देवता को आप निमंत्रण देते है वह देवता अपने वायुमय शरीर में आते है और जो आप भोग लगते हो उनकी सुगंध ग्रहण कर के चले जाते है।
मध्यम स्तर के देवताओ का शरीर तीन तत्वों से तथा उत्तम स्तर के देवता का शरीर दो तत्व -- तेज और आकाश से बना हुआ होता है ...l इसलिए देव शरीर वायुमय और तेजोमय होते है।
यह देवता वायु के रूप में गंध, तेज के रूप में प्रकाश को ग्रहण और आकाश के रूप में शब्द को ग्रहण करते है।
जैसे जो हम अन्न का भोग लगाते है, देवता उस अन्न की सुगंध को ग्रहण करते है, उसी से तृप्ति हो जाती है। जो पुष्प और धुप लगाते है, उसकी सुगंध को भी देवता भोग के रूप में ग्रहण करते है। जो हम दीपक जलाते है, उससे देवता प्रकाश तत्व को ग्रहण करते है।
आरती के दौरान जब घंट, शंख, मृदंग और ढोल नगारे बजाते है उसका देव लोग आकाश के माध्यम से ग्रहण कर के खुश होते है और आपको मन ही मन में आशीर्वाद प्रदान करते है।
कई बार तो आपकी भक्ति से खुश हो कर वरदान भी प्रदान करते है और उनकी शक्तियों से मिला हुआ वरदान सफल होता है। यही कारण से देव योनि खुश होती है और आपको सुख और समृद्धि प्रदान करती है।
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!! जय श्री कृष्ण!!